Sunday, July 26, 2009

आज हम ऐसे दौर में जी रहे है जहाँ जीवन जीने के साधन तो है पर जीवन कठिन है। जहाँ सुख सुविधाये तो है पर आनंद नहीं है।  कई बार बाहर के शोरगुल में हम अपने आप की आवाज़ ही नहीं सुन पाते जरा दो मिनट रुक के सोचिये की क्या हालत होती होगी उस व्यक्ति की जिसे काच के कमरे में बंद कर दिया गया हो और वो चिल्ला चिल्ला कर कुछ कहना चाह रहा हो पर साउंड प्रूफ कमरे से  हमें उसकी आवाज़ उसका दर्द नहीं सुनाई दे रहा हो। ठीक ऐसा ही हाल आज हमारा है।  जीवन जीने की इस आपाधापी में हम भी भाग रहे है दौड़ रहे है बस जाने ही जल्दी है जाना कहा है, ये भी नहीं मालूम पर जा रहे है, भाग रहे है, हमारा लक्ष्य क्या है, नहीं मालूम  पर जाना है।  सोचने का समय कहा है बस भागना है।
हम गैरो के तो पास तो हो रहे है, पर शायद अपने आप से खुद से बहुत दुर होते जा रहे है।
 वो "मै " जो हमेशा से मेरा था मेरा है और मेरे साथ ही चला जायेगा।  लेकिन उसी के लिए आज हमारे पास समय नही है।
 जिस दिन हम कभी एकांत  कर चिल्लाते हुए शख्स ध्यान से सुनने की कोशिश करेंगे तो समझ आएगा की वो क्या कहना चाहता है तब जीवन में दौड़ना बेमानी सा लगेगा तब किधर दौड़ना है उसकी सही दिशा मिलेगी और तब सारे सुख आनद देने लगेंगे …… क्युकी वो "मै " ही तो अंतर्ध्वनि है , एक चिर अनन्त आतंरिक सनातन नाद  .......

-अंकित राज व्यास 

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